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झाँसी की रानी/ Jhansi ki Rani Laxmi bai

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झाँसी की रानी                                    झाँसी की रानी सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरा नी थी          बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।                कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी। वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,                बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,                खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।       ...

यह कदंब का पेड़ - सुभद्रा कुमारी चौहान Yeh kadamb ka ped - Subhadra Kumari Chouhan

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यह कदंब का पेड़  -  सुभद्रा कुमारी चौहान  Yeh kadamb ka ped - Subhadra Kumari Chouhan     यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे। मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।। ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली। किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।। तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता। उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।। वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता। अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हें बुलाता।। सुन मेरी बंसी को माँ तुम इतनी खुश हो जाती। मुझे देखने काम छोड़ कर तुम बाहर तक आती।। Yeh kadamb ka ped - Subhadra Kumari Chouhan तुमको आता देख बांसुरी रख मैं चुप हो जाता। पत्तों में छिपकर धीरे से फिर बांसुरी बजाता।। गुस्सा होकर मुझे डांटती , कहती "नीचे आजा"। पर जब मैं ना उतरता , हंसकर कहती "मुन्ना राजा"।। " नीचे उतरो मेरे भैया तुम्हें मिठाई दूंगी। नए खिलौने , माखन-मिसरी , दूध मलाई दूंगी"।। बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता। माँ , तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।। तुम आँचल ...

Maa kah ek kahani (Maithili Sharan Gupta) मॉं कह एक कहानी (मैथीलशरण गुप्‍त की कविता)

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Maa kah ek kahani (Maithili Sharan Gupta) मॉं कह एक कहानी (मैथीलशरण गुप्‍त की कविता) Maa kah ek  kahani Maithili sharan gupta " माँ कह एक कहानी।" बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी ?" " कहती है  मुझसे यह चेटी , तू मेरी नानी की बेटी कह माँ कह लेटी ही लेटी , राजा था या रानी ? माँ कह एक कहानी।" " तू है हठी , मानधन मेरे , सुन उपवन में बड़े सवेरे , तात भ्रमण करते थे तेरे , जहाँ सुरभि मनमानी।" " जहाँ सुरभि मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।" Maa kah ek kahani (Maithili Sharan Gupta)  मॉं कह एक कहानी (मैथीलशरण गुप्‍त की कविता) वर्ण वर्ण के फूल खिले थे , झलमल कर हिमबिंदु झिले थे , हलके झोंके हिले मिले थे , लहराता था पानी।" " लहराता था पानी , हाँ-हाँ यही कहानी।" " गाते थे खग कल-कल स्वर से , सहसा एक हंस ऊपर से , गिरा बिद्ध होकर खग शर से , हुई पक्षी की हानी।" " हुई पक्षी की हानी ? करुणा भरी कहानी!" चौंक उन्होंने उसे उठाया , नया जन्म सा उसने पाया , इतने में आखेटक आया , लक्ष सिद्धि का मानी।...

Panchavati (Maithili Sharan Gupt) पंचवटी (मैथिली शरण गुप्त की कविता)

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  Panchavati (Maithili Sharan Gupt) पंचवटी  (मैथिली शरण गुप्त की कविता)   चारुचंद्र की चंचल किरणें , खेल रहीं हैं जल थल में , स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में। पुलक प्रकट करती है धरती , हरित तृणों की नोकों से , मानों झीम रहे हैं तरु भी , मन्द पवन के झोंकों से॥ पंचवटी की छाया में है , सुन्दर पर्ण-कुटीर बना , जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर , धीर वीर निर्भीकमना , जाग रहा यह कौन धनुर्धर , जब कि भुवन भर सोता है ? भोगी कुसुमायुध योगी-सा , बना दृष्टिगत होता है॥ किस व्रत में है व्रती वीर यह , निद्रा का यों त्याग किये , राजभोग्य के योग्य विपिन में , बैठा आज विराग लिये। बना हुआ है प्रहरी जिसका , उस कुटीर में क्या धन है , जिसकी रक्षा में रत इसका , तन है , मन है , जीवन है! Panchavati (Maithili Sharan Gupt) पंचवटी  (मैथिली शरण गुप्त की कविता)   आँखों के आगे हरियाली , रहती है हर घड़ी यहाँ , जहाँ तहाँ झाड़ी में झिरती , है झरनों की झड़ी यहाँ। वन की एक एक हिमकणिका , जैसी सरस और शुचि है , क्या सौ-सौ नागरिक जनों की , वैसी विमल रम्य रुचि है ?...