Aa rahi ravi ki sawari आ रही रवि की सवारी - डॉ हरिवंश राय 'बच्चन' Dr. Harivansh roy Bacchan
नव-किरण का रथ सजा है,
कलि-कुसुम से पथ सजा है,
बादलों-से अनुचरों ने स्वर्ण की पोशाक धारी।
आ रही रवि की सवारी।
कलि-कुसुम से पथ सजा है,
बादलों-से अनुचरों ने स्वर्ण की पोशाक धारी।
आ रही रवि की सवारी।
विहग, बंदी और चारण,
गा रही है कीर्ति-गायन,
छोड़कर मैदान भागी, तारकों की फ़ौज सारी।
गा रही है कीर्ति-गायन,
छोड़कर मैदान भागी, तारकों की फ़ौज सारी।
आ रही रवि की सवारी।
चाहता, उछलूँ विजय कह,
पर ठिठकता देखकर यह,
रात का राजा खड़ा है, राह में बनकर भिखारी।
पर ठिठकता देखकर यह,
रात का राजा खड़ा है, राह में बनकर भिखारी।
आ रही रवि की सवारी।
- डॉ हरिवंश राय 'बच्चन'

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