जीवन का चक्रव्यूह
लाखों पैसे कमाऊंगा,
एक घर नया बनाऊंगा,
जब मैं बड़ा बन जाऊंगा।
न स्कूल, न बस्ता होगा,
न होगी किताब, न कलम,
नोकर होंगे आसपास,
बस बिस्तर और आराम होगा।
गाड़ी नई भी लाऊंगा,
जब मैं बड़ा बन जाऊंगा।
मुसीबतों से लड़ना होगा,
कठिन कर्म भी करना होगा,
मेहनत मेरी रंग लाएगी,
सफलता द्वार चढ़ जायेगी।
दान-पुण्य भी कर पाऊंगा,
जब मैं बड़ा बन जाऊंगा।
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जब तुम बड़े बन जाओगे,
लाखो पैसे कमाओगे,
अब तुमको कौन बतायेगा?
तुम सुख कहाँ से लाओगे।
समय बिताते घर पर जो,
वह समय कहाँ से लाओगे।
अब तुमको कौन बतायेगा?
ये जाल है माया का,
जो कोई बिछा कर चला गया।
सैकड़ो धन्ना बताते है,
वो दुख में जीवन बिताते है,
चिंता सताती निरन्तर उनको,
वे स्वास्थ्य अपना गंवाते है।
अब तुमको कौन बतायेगा?
ये चक्रव्यूह है जीवन का,
जो कोई द्रोण बना गया।


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