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Pushp ki abhilasha/ Chah nahi poem/ पुष्‍प की अभिलाषा / माखनलाल चतुर्वेदी / Makhanlal Chaturvedi

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Chah nahi poem / Pushp ki abhilasha Chah nahi poem पुष्‍प की अभिलाषा Pushp ki abhilasha chah nahi poem / pushp ki abhilasha चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ, चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्‍यारी को ललचाऊँ, चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ, चाह नहीं देवों के सिर पर चढूँ भाग्‍य पर इठलाऊँ, मुझे तोड़ लेना बनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक। मातृ-भूमि पर शीश चढ़ानें जिस पथ जायें वीर अनेक। Chah nahi poem  /  Pushp ki abhilasha -     माखनलाल चतुर्वेदी               Makhanlal Chaturvedi

yeh diya bujhe nahi Nishith ka diya । निशीथ का दिया । गोपाल सिंह नेपाली । Gopal Singh Nepali

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yeh diya bujhe nahi  Yeh diya bujhe nahi   घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो, आज द्वार-द्वार पर,यह दिया बुझे नहीं, यह निशीथ का दिया,ला रहा विहान है। शक्‍ति का दिया हुआ, शक्‍ति को दिया हुआ, भक्‍ति से दिया हुआ, यह स्‍वतंत्रता-दिया, रुक रही न नाव हो, जोर का बहाव हो, आज गंग-धार पर, यह दिया बुझे नहीं, यह स्‍वदेश का दिया प्राण के समान है। यह अतीत कल्‍पना, यह विनीत प्रार्थना, यह पुनीत भावना, यह अनंत साधना, शांति हो, अशांति हो, यंद्ध,संधि,क्रांति हो, तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं, देश पर, समाज पर, ज्‍योति का वितान है। तीन-चार फूल है, आस-पास धूल है, बांस है-बबूल है, घास के दुकूल है, वायु भी हिलोर दे, फूंक दे, चकोर दे, कब्र पर, मजार पर, यह दिया बुझे नहीं, यह किसी शहीद का पुण्‍य-प्राण दान है। झूम-झूम बदलियॉं, चूम-चूम बिजलियॉं, आंधियां उठा रहीं हलचलें मचा रहीं, लड़ रहा स्‍वदेश हो, यातना विशेष हो, क्षुद्र जीत-हार पर, यह दिया बुझे नहीं, यह स्‍वतंत्र भावना का स्‍वतंत्र गान है। Yeh diya bujhe nahi ...

gandhi ban jaunga मैं गांधी बन जाऊं

gandhi ban jaunga माँ , खादी की चादर दे दें , मैं गांधी बन जाऊं। सब मित्रों के बीच बैठ फिर रघुपति राघव गाऊँ। निकर नहीं धोती पहनूँगा , खादी की चादर ओढूँगा , घड़ी कमर में लटकाऊँगा , सैर सवेरे कर आऊँगा। छूत-अछूत नहीं मानूंगा , सबको अपना ही जानूंगा , एक मुझे तू लकड़ी ला दे , टेक उसे मैं बढ़ जाऊंगा। मैं बकरी का दूध पिऊँगा , जूता अपना आप सिऊँगा। आज्ञा तेरी मैं मानूँगा , सेवा का प्रण मैं ठानूँगा। मुझे रुई की पूरी दे दे , चर्खा खूब चलाऊँ , माँ , खादी की चादर दे दे , मैं गाँधी बन जाऊँ। कभी किसी से नहीं लडूंगा , और किसी से नहीं डरूंगा , झूठ कभी मैं नहीं बोलूंगा , सदा सत्‍य की जय बोलूंगा। माँ , खादी की चादर दे दें , मैं गांधी बन जाऊं। gandhi ban jaunga                                                                                        ...

Aa rahi ravi ki sawari आ रही रवि की सवारी - डॉ हरिवंश राय 'बच्चन' Dr. Harivansh roy Bacchan

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Aa rahi ravi ki sawari आ रही रवि की सवारी। नव-किरण का रथ सजा है, कलि-कुसुम से पथ सजा है, बादलों-से अनुचरों ने स्‍वर्ण की पोशाक धारी। आ रही रवि की सवारी। विहग, बंदी और चारण, गा रही है कीर्ति-गायन, छोड़कर मैदान भागी, तारकों की फ़ौज सारी। आ रही रवि की सवारी। चाहता, उछलूँ विजय कह, पर ठिठकता देखकर यह, रात का राजा खड़ा है, राह में बनकर भिखारी। आ रही रवि की सवारी।          - डॉ हरिवंश राय 'बच्चन'

Desh ki mati देश की माटी - रविंद्रनाथ ठाकुर Rabindranath Tagore

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Desh ki mati Rabindranath Tagore - Desh ki mati देश की माटी देश का जल हवा देश की देश के फल सरस बनें प्रभू सरस बनें। देश के घर और देश के घाट देश के वन और देश के बाट सरल बनें प्रभू सरल बनें। देश के तन और देश के मन देश के घर के भाई-बहन विमल बनें प्रभू विमल बनें।              -   रविंद्रनाथ ठाकुर                   Rabindranath Tagore - Desh ki mati

Satpura ke ghane jungle poem सतपुड़ा के घने जंगल - भवानी प्रसाद मिश्र Bhavani prasad mishra

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Satpura ke ghane jungle poem Satpura  ke ghane jungle poem सतपुड़ा  के घने जंगल। नींद में डूबे हुए से ऊंघते अनमने जंगल। झाड ऊंचे और नीचे, चुप खड़े हैं आंख मीचे, घास चुप है, कास चुप है मूक शाल, पलाश चुप है। बन सके तो धंसो इनमें, धंस न पाती हवा जिनमें, सतपुड़ा के घने जंगल ऊंघते अनमने जंगल। सड़े पत्ते, गले पत्ते, हरे पत्ते, जले पत्ते, वन्य पथ को ढंक रहे-से पंक-दल में पले पत्ते। चलो इन पर चल सको तो, दलो इनको दल सको तो, ये घिनौने, घने जंगल नींद में डूबे हुए ऊंघते अनमने जंगल। Satpura ke ghane jungle poem अटपटी-उलझी लताएं, डालियों को खींच खाएं, पैर को पकड़ें अचानक, प्राण को कस लें कपाएं। सांप सी काली लताएं बला की पाली लताएं लताओं के बने जंगल नींद में डूबे हुए ऊंघते अनमने जंगल। Satpura  ke ghane jungle poem मकड़ियों के जाल मुंह पर, और सर के बाल मुंह पर मच्छरों के दंश वाले, दाग काले-लाल मुंह पर, वात-झन्झा वहन करते, चलो इतना सहन करते, कष्ट से ये सने जंगल, नींद में डूबे हुए ऊंघते अनमने जंगल। अजगरों से भरे जंगल। अगम, गति से...

चल रे मटके टम्मक टूँ - Chal re matke tammak too

हुए बहुत दिन बुढ़िया एक, चलती थी लाठी को टेक , उसके पास बहुत था माल,  जाना था उसको ससुराल, मगर राह में चीते शेर लेते थे राही  को घेर , बुढ़िया ने सोची तदबीर जिससे चमक उठी तक़दीर, मटका एक मंगाया मोल लम्बा-लम्बा गोल मटोल, उसमे बैठी बुढ़िया आप वह ससुराल  चली चुपचाप , बुढ़िया गाती  जाती यूँ  चल रे मटके टम्मक टूँ।    -लेखक  अज्ञात